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    Tuesday, December 20, 2016

    कात्या के काले चेहरे को कवि पहचान गया..... कांग्रेस नहीं!



    भियां सबको मेरा नमस्कार....।    काले साये में पैदा हुआ कात्या दुसरों की हमेशा नाव डुबोता आ रिया है... मगर भियां मेरी कोई बात ही नही समझ रिया है..... वो कहते है न भियां लक्ष्मी दगा दे सकती है लेकिन सरस्वती नही.... अब आप के रिये होंगे हमें क्या करना लक्ष्मी और सरस्वती से.... हमारे लिए तो दोनों देवी है... एक धन देती तो दुसरी ज्ञान.... लेकिन भियां मैं इसलिए ये के रिया हुं... कि विगत दिनों कुछ ऐसा भरे मंच पर हुआ.... सरस्वती ने दहाड लगाई और जो बात मैं के रिया था... और उसे कोई नी मान रिया था..... लेकिन जब यही बात मंच से कही गई...... तो भियां सब ने हां में हां मिलाई.... बात सटीक और सच्ची बता रिया हुं....
    भियां में केता आ रिया हुं की कात्या के काले साये से बच के रेना लेकिन ये बात किसी को समझ में नी आई.... वो बात एक कवि ने मंच पर खडे रह कर समझ ली... मगर फिर भी भियां कांग्रेस को ये बात समझ में नी आ री.... तो भियां कांग्रेस के कैसे अच्छे दिन आ सकते हैं.....
    भियां विगत दिनों जिले के समाजसेवियों के नगर में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया.... कवि सम्मेलन में धुरन्धर कवि आ रिये थे... कात्या को भी बडे सम्मान के साथ कवि सम्मेलन में बुलाया गिया.... तो कात्या आठवीं फेल बाप बेटे और दाढी में तिनके वाले चमचों के साथ कवि सम्मेलन में बडे ठाट-बाट के साथ पहुंच गिया.... कवि सम्मेलन में बिना पैसों की भीड बडी संख्या में साहित्य का रस लेने के लिए जमा हुवे..... कवि सम्मेलन में सरस्वती के पुत्रों ने जोरदार प्रस्तुतियां दी.... इसी बीच एक सरस्वती पुत्र की नजर कात्या पर पडी और सरस्वती पुत्र ने कात्या की कलाकारी को पकड लिया..... और भरे मंच से बडी संख्या में एकत्रित भीड के सामने ही कात्या को कह दिया...... ये महाश्य जिस नाम में बैठते है उसे डूबो कर खुद उतर जाते है..... नाव बेचारी डुब जाती है और ये निकल लेते है.... इतना कहते ही उपस्थित भीड को कांग्रेस चुनावी नजारा सामने आने लगा और भीड भी समझ गयी.... सरस्वती पुत्र मंच से कात्या का मुखोटा उतार रिया है....
    इतना ही नही कवि इस बात को बार बार दोहराता रिया... और उपस्थित लोगों ने तो ठिक... कात्या के आठवीं फेल चमचें भी सही बात- सही बात कह कर ठहाके लगा रिये थे ....भियां जब दुसरे दिन कात्या कौर और कात्या के चमचें... जो सही है सही है के रिये थे.... उन्हे ये बात समझ में आई...कि असल में सरस्वती पुत्र कवि क्या के  रिया था.... तब उनके चेहरे देखने लायक थे.... क्योंकि भियां उनको समझ में आ गिया था... कि उन्हे भरी भीड में शब्दों के माध्यम से जूते मारे  जा रिये थे.... भियां अब समाजसेवियों की नगरी में ये चर्चा हैं कि......... जो बात दुर दराज से आये कवि कात्या के काले चेहरे को पहचान गए... उसे चेहरे को कांग्रेस क्यो पहचान नी री है...

    भियां अब में चलता हुं.... पर एक बात जरूर कहुंगा बिना ज्ञान वालों के साथ रहने पर ऐसा ही होता है.... जिन्हे शब्द का ज्ञान नही वो कह रिये  है.... इसे कुछ नही आता... भियां जाते जाते एक वाक्या याद आ गिया.... कुछ सालों पहले में जब एक अखबार में काम कर रिया था तो मेरे मालिक ने इन आठवी फेल बाप बेटे को बहुत खरी खरी सुनाई थी और कार्यालय से धक्के मारकर बहार करने की बात कही थी..... मगर कुत्ते की दुम टेढी की टेढी... भियां वाक्ये तो बहुत है लेकिन समय नही... इसलिए किसी को छोटा न समझे... अब जा रिया जय माता दी।

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