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    Friday, December 9, 2016

    कौन भड़का रहा है आंदोलन की आग, आखिर लाल पानी का गुनाहगार है कौन ?


    जिले के मजदूर वर्ग आदिवासी हो अथवा किसान कभी भी आंदोलन अख्तियार नही करता । भले ही उनका शोषण सुदखोर करे या सरकारी भ्रष्ट तंत्र । लेकिन ये भी सच है कि आदिवासी जरजोरू और जमीन के लिए जान दे भी सकते है तो जान लेने से भी नही हिचकते । जिले में आंदोलन की पंरपरा राजनैतिक,सरकारी व  गैरसरकारी संगठनों से शुरू हुई । यह परम्परा अब किसानमजदूर, आदिवासियों में भी पैठ करने लगी है । पिछले दो साल से औद्योगिक क्षेत्र मेघनगर में आंदोलन हो रहे हैं । लोगों की अपनी समस्याएं जो जायज भी हैं । लेकिन बड़ा सवाल ये है कि पिछले 6 महीने से इस आंदोलन में तेजी आई है, आखिर भोलभाले आदिवासियों को आंदोलन की आग में भेजने वाला कौन है, और उसकी मंशा क्या है । इसका राज मेघनगर औद्योगिक क्षेत्र में गत वर्ष जीवन बचाव आंदोलन से सामने आने लगा । उक्त आंदोलन के बाद लगातार मेघनगर औद्योगिक क्षेत्र की फिजा ही बदलने लगी। अभी तक तो आरोप फैक्टीयों पर जहर उगलने का ही लग रहा था पर अब स्थितियां इतनी विकट हो चुकी है कि अपने फायदे के लिए ग्रामीणों को मोहरा बनाकर एक दूसरे को निशाना बना रहे हैं ।
    अब बात करते हैं हाल ही में हुए ट्रेंट  केमिकल फैक्ट्री के बाहर महिलाओं द्वारा दिए गए धरने की। जहां महिलाओं का आंदोलन, आंदोलन नहीं नाटक लग रहा था। सुबह से धरने पर बैठी महिलाओं का कहना था कि ट्रेंट केमिकल फेक्ट्री से निकल रहे दूषित पानी की वजह से उन्हे कई तरह की बीमारियां हो रही, बच्चे बीमार हो रहे हैं, कई तरह के दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं, जानवर भी मर रहे है। यह बात सुन कर बडा दुख हुआ। मगर कुछ सवाल भी मन में आ गए । हरी गुलाबी साड़ी पहनी इन महिलाओं की गैंग ऐसी लग रही थी की मानो उन्हें उनकी संस्था ने पुरी तरह से समझा बुझा कर भेजा हैबातों में सच्चाई भी है, जिसे देख-सुनकर दुख होता है । लेकिन पूरा मामला एक विस्तृत जांच का विषय है । जिसको लेकर ना तो एकेवीएन,ना ही प्रदुषण विभाग और ना ही जिला प्रशासन संजीदा है ।  लेकिन धरने और धरने में शामिल लोगों देखकर ऐसा लग रहा था कि आंदोलन नही हंसी ठिठोली करने आये हैं । जिस तरह से नारे लगाए जा रहे थे उससे तो ऐसा लग रहा था कि इन आंदोलनकारियों को किसी बात का दुख नही है। सूत्रों का कहना है कि कई ऐसे लोग है जिन्होने उक्त फैक्ट्री से बडा कमीशन मांगा था नहीं देने पर उन्होंने इस तरह के आंदोलन करने की बात भी कही थी। पिछली बार भी कुछ ऐसा ही हुआ था। लेकिन कलेक्टर न्यायालय में जब जांच की गई तो फैक्ट्री को क्लीन चिट मिल गई थी। कल सुबह की ही बात करें, तो 10 से 12 मजदुरों को उक्त फैक्ट्री में काम पर नही लगाया गया। जिसके चलते कुछ छूटभईये नेता वहां पहुंच गए थे और इस आंदोलन में वहां उपस्थित थे और यह कहते नजर आए कि पुरी और गुरमुख साहब को हटा दो इस तरह के आंदोलन नहीं होगें। 
    फैक्ट्री पर यह आरोप लगाया गया था कि इस फैक्ट्री से कैमिकल वाला पानी निकल रहा है। पूर्व कलेक्टर भी वहां पहुंची थी और जांच के आदेश दिए थे जांच के दौरान फैक्ट्री कर्मचारियों द्वारा फैक्टी में लगे ट्रीटमेंट प्लान्ट के बारे कलेक्टर को अवगत करवाया, और बताया कि फैक्ट्री से जो कैमिकल युक्त पानी वेस्ट के रूप में निकलता उसे ट्रिटमेंट प्लान की सहायता से नष्ट किया जाता है ।  
    तो बड़ा सवाल ये है कि आखिर ये लाल पानी है किसका । मेघनगर औघोगिक क्षेत्र में दूषित पानी तो कई फैक्ट्रियों से निकलता है, ट्रेंट कैमिलल के ने से पहले तो तालाब, हैंडपंप, कुएं समेत आसपास के 7 कि.मी. दायरे में आने वाले जलस्त्रोत प्रदुषित हो गए थे, गुस्साए लोगों ने फैक्ट्रियों पर पथराव तक कर दिया था । तो एकेवीएन,प्रदुषण विभाग और जिला प्रशासन की जांच, निरीक्षण और दौरों के दायरे में केवल ट्रेंट कैमिकल ही क्यों है । सूत्रों की माने तो कई फैक्ट्रियां दिन में आराम फरमाती हैं लेकिन रात में डाई कैमिकल के लिए जी तोड़ मेहनत करती हैं । बाकी फैक्ट्रियों में भी अगर जाकर देखें तो एक नहीं कई ट्यूबवेल खुदे मिल सकते हैं । जिनकी सहायता दूषित पानी जमीन में उतारा जाता है । कई फैक्ट्रियों से तो ऐसे कैमिकल निकलते है कि अगर गाड़ी के टायर पर वो कैमिकल वाला पानी लग जाए तो टायर खराब हो जाते हैं । एकेवीएन प्लाट नंबर 193 जहां कभी दूषित पानी छोड़ा गया था वहां के पत्थर हाथ में लेते ही राख हो जाते हैं ।
    तो ट्रेंट कैमिकल निशाने पर क्यों । प्रदुषण विभाग और एकेवीएन जवाब दे कि साल भर पहले जो सैंपल लिए गए थे, उनकी जांच रिपोर्ट का क्या हुआ । पिछले साल जो दूषित पानी निकला था, जानवर मरे थे, आमली पठार तालाब का पानी लाल हो गया था, आमलीपठार स्कूल के हैंडपंप से लालपानी जो निकल रहा था वो कहां से आया था, उसका जिम्मेदार कौन था ।
    ट्रेंट कैमिकल की इतनी सारी जांचों और दौरों की जानकारी अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं है । और पिछले कुछ महीनों में बाकी फैक्ट्रियों को जांच की इस प्रक्रिया से क्यों बख्शा गया । जांच में जो भी दोषी हो उसे कानून के तहत सजा मिले लेकिन क्या एकेवीएन और प्रदुषण बोर्ड की क्या मजबूरी है कि जांच का दायरा एक ही फैक्ट्री तक क्यों सीमित है । सवाल कई हैं लेकिन जवाब कुछ भी नहीं । औद्योगिक क्षेत्र की इस महामारी को लेकर पड़ताल आगे भी जारी है ।

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