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    Wednesday, February 22, 2017

    .हम न तो दाना मांझी से सिख ले सकते है... और न ही मनोज के इस कचरे में पढे शव से....


    वो कैसे इंसान हैं..... जिसमें इतना बल था कि दस किलोमीटर तक अपनी पत्नी के शव को लादे चलता गया..... उसकी बारह साल की बेटी जो जाहिर तौर पर हमारी किसी ‘बेटी बचाओ’ योजना का हिस्सा नहीं होगी.... बिलखती रही.... लाश को कंधे पर लादे यह जो दाना जा रहा है, वह अपनी जीवन संगिनी नहीं हमारी व्यवस्था की लाश ढो रहा थां......कहने को मुल्क बदल रहा है, परिवर्तन के नारों से आकाश तक आतंकित हो रहा है, लेकिन दाना माझी और उसके जैसे अनगिनत नागरिक जीवन के समंदर में लाशों को उठाए दौड़ रहे हैं लेकिन हमारी मानवीय संवेदनाएं मर चुकी हैं.... इंसानियत को शर्मसार करने वाला एक और मामला सामने आया जहां पुलिस ने मृतक के शरीर को बदबु मारती कचरा वाहन में पीएम के लिए अस्पताल पहुंचाया।
    इन मामलों से कोई सिख लेना नही चाहता और बार बार वहीं करता है जो मानवीय मूल्य से कोसो दुर है.... सावाल यह भी है क्या हमारे अपने परिजनों के शव के साथ भी वैसा ही नियम कायदे अपनाऐंगे जैसे कि आज बहादुर सागर तालाब में कूद कर आत्महत्या करने वाले युवक के शव के साथ किया गया... वह तो भला हो परिजनों का जिन्होने ऐसे विपरित समय में भी शव को रखने के लिए खाट दे दी.... नही तो पुलिस ने मानवीय मूल्यों को ताक में रख शव को सीधे सीधे करचारा ढोले वाले नगर पालिका ट्रेक्टर  ट्राली में ही चढवा दिया था।
    क्या यहीं है पुलिस की मानवीय संवेदना.... और जिम्मेदारी... वर्तमान में पुलिस अधीक्षक महेशचंद जैन पुलिस का मानवीय और सेवाभावी चेहरा निखारने की बात कर रहे है.... ऐसे में कचरा ढोने वाली गाडी( ट्रेक्टर  ट्राली ) में शव ले जाना कई सवालों को जन्म दे रहा है.... कहीं ऐसा तो नही पुलिस अधीक्षक की मुहीम... थोथा चना बाजे घना जैसे या फिर अवार्ड प्राप्ती के लिए तो नही...।

    आज एक बार फिर झाबुआ पुलिस का शर्मशार करने वाला चेहरा सामने आया.... किसी ने बहादूर सागर तालाब में अज्ञात व्यक्ति के शव के तैरने की सूचना कोतवाली पुलिस को दी.... जिसके बाद मौके पर पहुंची पुलिस ने नगर पालिका के सफाई कर्मियों के सहयोग से लाश को तालाब से बाहर निकाला... तो शव की पहचान मोजीपाडा निवासी मनोज पिता भीमसिंह उम्र 35 वर्ष की हुई। मनोज की गुमशुदगी की रिपोर्ट मंलवार को कोतवाली थाने पर उसकी पत्नी ने दर्ज करवाई थी। जिसके बाद आज सुबह 10 बजे के लगभग उसका शव तालाब में तैरता दिखाई दिया।
    सारी औपचारीकता पूर्ण करने के बाद पुलिस को जिला चिकित्सालय से शांति वाहन को बुला कर लाश को पोटमार्टम के लिए रवाना करना था लेकिन पुलिस ने ऐसा नही करते हुए मनोज के शव को सीधे उठवाकर कचरा वाहन में डाल दिया...। इस दृश्य को देख परिजनों को भी ठिक नही लगा.... पुलिस को बोले भी तो कैसे.... ट्राली में काफी कचरा पडा हुआ था... तो परिजन तुरंत घर जाकर खाट लाए और शव को उस पर रखा... जिसके बाद शव को पोटमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय पहुंचाया गया..... लेकिन जिम्मेदार पुलिस कर्मियों को कचरे में पडे मनोज के शव को देख कुछ भी गलत नही लग रहा था...।

    जिला मुख्यालय पर हुए इस हादसे को देख ऐसा लग रहा है कि पुलिस अपनी मानवीय संवेदना खो चुकी है... पुलिस कप्तान महेशचंद जैन पर्यावरण संरक्षण एवं समाजिक गतिविधियों को कर पुलिस का मानवीय चेहरा निखारने में लगे है... ऐसे में मनोज शव कचरा वाहन में जाना उनकी कार्याप्रणाली भी सवालिया निशान खडे कर रहा है... क्या पुलिस कप्तान ये सामाजिक गतिविधियां महज दिखावे के लिए कर रहे है या फिर अवार्ड के लिए... खैर जो भी हो इस डिजीटल युग में  वास्तविकता यह है कि हम न तो दाना मांझी से सिख ले सकते है... और न ही मनोज के इस कचरे में पढे शव से....।

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