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    Thursday, March 23, 2017

    भगोरिया प्रेम पर्व नहीं एक हाट है.............


    बेनेडिक डामोर एवं बालू भूरिया द्वारा रचित..................  
    ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है, वातावरण में हल्की-हल्की गर्मी, हल्की-हल्की ठण्ड होती है, खेतों से रबी की फसल संग्रहित कर ली जाती है, पलास के फूल सर्वत्र प्रकृति को रंगीन एवं मनमोहक बनाते है, पेड़ों पर नये पते आ जाते है, महूऐ के फूल महकने लगते है, ताड़ से ताड़ी बहने लगती है, प्रकृति अपनी यौवनावस्था का जादू दिखाती है तब आदिवासीयों के विश्वविख्यात हाट भगोरिया हाट का आगमन होता है। प्रकृति पूजक आदिवासीयों में प्राकृतिक उत्साह एवं उमंग होता है जिसका प्रतिबिम्ब भगोरिया हाट में देखने को मिलता है। भगोरिया हाट आदिवासियों के लिए दुगुनी खुशी लेकर आता है क्योंकि एक तरफ होली पर्व तो दूसरी तरफ बाबा गळ देव का पर्व होता है जिसे आदिवासी अति उत्साह एवं धुमधाम से मनाते है।

      भगोरिया हाट का श्री गणेश होली के एक सप्ताह पूर्व होता है जिसका आयोजन सप्ताह भर अलग-अलग दिन अलग-अलग स्थान पर साप्ताहिक हाट के दौरान होता है। भगोरिया वास्तव में कोई पर्व नहीं है यह एक हाट ;उंतामज कंलद्ध है। इस दिन आदिवासी होली तथा बाबा गळ देव पूजन सामग्री खरीदते है। भगोरिया हाट अन्य हाट की तुलना में विशेष इसलिए होता है क्योंकि इस दिन मेले का आयोजन होता है जिसमें झुले, चकरी, मिठाइयाँ, खिलौने, मनोरंजन आदि की दुकाने लगती है जिसे देखने के लिए बच्चे-बुढ़े सभी में उत्साह होता है। इस हाट को और मजेदार एवं मनोरंजक बनाने के लिए आदिवासी युवक -युवतियाँ, बच्चे-बुजुर्ग आदि पारम्परिक वाद्य यंत्रों के साथ नृत्य करते हुए अपनी-अपनी टोलियों में हाट आते है। ये टोलियाँ अक्सर बाबा गळदेव मन्नतधारी युवक के साथ में आती है जो बाज़ार में नृत्य करते तथा गीत गाते हुऐ घुमती है। आदिवासी भगोरिया हाट में झुले, चकरी, कुल्फी, पान आदि का भरपूर लुत्फ उठाते है। बच्चे खिलौने खरीदते है तो युवतियाँ श्रंगार सामग्री खरीदती है। हर गली सड़क पर आदिवासी लोक गीतों के तराने सुनाई देते है। आदिवासी ढोल मांदल की थाप पर थिरकते हुए अपनी संस्कृति में विलिन हो जाते है। भगोरिया हाट को निहारनें एवं आदिवासियों की संस्कृति से रूबरू होने देश -विदेश के विभिन्न कोनें से लोग आते है।
      भगोरिया हाट न केवल एक साधारण हाट या मेला है बल्कि इसकी अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। भगोरिया शब्द की उत्पत्ति झाबुआ जिले के भगोर गांव से हुई है। ऐसा माना जाता है लगभग तेरहवीं सदी में भगोर एक बड़ी सियासत थी। इन्दौर और रतलाम इसके खण्ड थे। भग्गा नायक भील भगोर का राजा था। जिसके नाम से भगोर गांव का नामकरण हुआ। कुछ इतिहासकार एवं शोधकर्ता नायक शब्द को लबाना जनजाति से जोड़ते है लेकिन वास्तविकता यह है कि आदिवासी लोक भाषा में राजा को नायक तथा गांव के मुख्या को तड़वी कहा जाता था। लोग कहते है कि भग्गा नायक प्रतिवर्ष रबी फसल कटने के बाद साप्ताहिक हाट के दिन अपने क्षेत्रवासियों के लिए वार्षिक स्नेहभोज का आयोजन करता था जिसका लुत्फ उठाने के लिए के आदिवासी अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल मांदल आदि के साथ आते थे और दिन भर नाच-गान करते थे। धीरे-धीरे इस प्रकार के आयोजन आसपास के नायक भी अपने-अपने क्षैत्रों में करने लगे। इस हाट को सब जगह भगोरिया हाट के नाम से जाना पहचाना गया और समय के साथ भगोरिया आदिवासियों का सांस्कृतिक हाट बन गया।


    वर्तमान में इस हाट को आदिवासियों का प्रणव पर्व, वेलेन्टाइन डे आदि नामों से जाना जाता है जो कि गलत एवं अधुरा शोध है। वास्तविकता से इसका कोई तालूक नहीं है। आजकल इन्टरनेट, पत्रिका, समाचार पत्र आदि में ऐसा प्रसारित किया होता है कि भगोरिया हाट में आदिवासी युवक-युवतीयाँ एक दूसरे को पसन्द करते है, गुलाल लगाते है, पान खिलाते है और आपसी सहमती से भाग कर शादी कर लेते है। बाद में समाज उसे विधिवत सामाजिक मान्यताओं के तहत स्वीकार कर लेता है। जो कि असत्य एवं गलत माध्यम से प्राप्त जानकारी है। सत्यता यह है कि आदिवासीयों मे एक परम्परा है जिसे आदिवासी लोक भाषा में ं;पश्चिमी मध्यप्रदेशएगुजरात व राजस्थान की सीमा से लगे क्षेत्र मेंद्धहोळी गोट यानि (होली का चन्दा) कहते है व् अलीराजपुरएखरगोनए धारए बड़वानी व निमाड़ क्षेत्र में भोंगर्या कहा जाता है ! इस परम्परा में लड़कियाँ अपने फुफाजी, मौसाजी, जियाजी या उनके रिश्तेदारों को भगोरिया हाट में होळी गोट लेने के लिए एक-दूसरे का हाथ पकड़कर घेरा बनाकर घेरती है और जब तक होली गोट नही मिल जाता तब तक घेर कर इस प्रकार गीत गाती है। हाँकळड़ी मां घेर्यो रे फुवा घेरियो, हाँकळड़ी तोड़ी नाठो हरामी घेरियो, होळी गोट मांगे हाळियों रे फुवा घेरियो। दूसरा गीत इस प्रकार गाती है तारी गेहरण्यो मांगे होळी गोट तारी बयेर राखूं फुवा रे, तारा खलिया फाड़ी आल होळी गोट तारी बयेर राखूं फुवा रे। इस गीत का अर्थ इस प्रकार है। लड़कियाँ कहती है कि फुफाजी हमने आपको जंजीरों में जकड़ लिया है। आपको होळी गोट देना पड़ेगा। हम आपकी गेहरण यानि चन्दा मांगने वाली सालियां है। आप अपनी जेब फाड़ो या कुछ भी करो आपको चन्दा देना ही पड़ेगा। कभी-कभी फुफाजी, मौसाजी, जियाजी आदि के घर वाले लड़के बाजार में मिल जाते है तो मौका पाकर उन्हें भी घेर लेती और गुलाल लगाती है। यदि उनके पास चन्दा देने के लिए पैसे या उपहार नहीं होता है, तो वह किसी तरह जंजीर तौड़कर भाग जाता है। यह दृश्य अन्य लोगों के लिए हास्यप्रद होता है। किसी आदिवासी भाई या बहन से जब इस संबंध में पुछा जाता है कि ये क्या कर रहा है तो वह अपनी ही भाषा को तोड़ मरोड़कर पुछने वाले को हिन्दी में उत्तर देने का प्रयास करता और कहता है भागीरियो। पुछने वाला समझता है कि यह भागने वाली प्रथा भागीरियो प्रथा है जिसमें लड़का-लड़की को पसन्द कर भाग जाता है और बाद में समूह से पृथक होकर शादी कर लेता है। इस प्रकार की अधुरी समझ के कारण भगोरिया को प्रेमपर्व, प्रणय पर्व, आदिवासीयों का वेलेन्टाइन डे आदि की संज्ञा प्राप्त हुई जो कि गलत एवं झुठी जानकारी है।
     
    भगोरिया हाटध्भोंगार्या हाट को पर्व की संज्ञा देना भी तर्क सांगत नहीं हैएक्योंकि सभी धर्म समुदायों में उनके द्वारा जितने भी तीज.त्यौहार मनाये जाते है उनमे किसी न किसी देवी.देवताओंएइष्टदेव या कुलदेवी का पुंजन किया जाता है! इसी प्रकार आदिवासी समुदाय में दितवारिया एनिपी;बाबादेवद्धएनवाई एदिवासएईदलएचौदसएआदि जितने भी त्यौहार मनाये जाते हैए उन सभी अवसरों पर किसी न किसी देवी.देवताएइष्टदेवएकुलदेवीएखात्रीस;पूर्वजद्ध या पृकृति की पूजा.अर्चना की जाती है! परन्तु भगोरिया हाटध्भोंगार्या हाट में किसी भी देवी.देवताए इष्टदेव या खत्री;पूर्वजद्ध या पृकृति की पूजा नहीं की जाती है! इसलिए भगोरियाध्भोंगार्या यह त्यौहारध्पर्व न होकर एक हाट मात्र है!


    आदिवासी इस हाट  को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते है। झाबुआ और पलवाड़ के आदिवासी इसे सरोड़ियूं हाट या गलालियूं हाट कहते है । अलिराजपूर, कुक्षी, बाग, टाण्डा तथा निमाड़ के अन्य क्षैत्रों के आदिवासी इसे भोन्ग्र्या हाट कहते है। यह भिन्नता आदिवासी लोक भाषाओं में भिन्नता के कारण है, लेकिन इसका आयोजन सर्वत्र एक समान होता है। प्रत्येक क्षैत्र का भगोरिया हाट उस क्षैत्र की संस्कृति को प्रतिबिम्बीत करता है। होली के दिन वाला हाट भुखड्या हाट कहलाता है। इस हाट में आदिवासी उपवास करके पूजन सामग्री खरीदने आते है। शाम को होली की तरफ मुँह कर पूजा करते और बाद भोजन करते है। अधिकतर आदिवासी होलिका दहन के पहले उपवास नहीं तोड़ते। प्रत्येक गांव में ग्रामवासी होलीका दहन के लिए जाते है। होलिका दहन के बाद वे महुआ दारू, ताड़ी आदि का सेवन करते है तथा पुरे गांव में घर-घर पूरी रात गेहर घुमते और होली गोट नारियल, माजम, कांकणी, दारू आदि मांगते है। संग्रहित सामग्री को सभी साथ बैठकर आपस में मिल बाँट खाते है। अगले दिन सुबह सब अपने-अपने घर जाते है और नई रबी फसल की पूजा करते है। आदिवासी लोक भाषा में इस पूजा को आसणी कहते है। इस दिन कोई विशेष भोजन नहीं बनता है। नई फसल गेहँू या जौ की रोटी तथा चने की दाल बनती है। जिसे मिलन उपहार के रूप में रिश्तेदारों को बाँटते है।
      नवीन फसल पूज़न के बाद सभी ग्रामवासी बाबा गळ देव मन्नतधारी व्यक्ति के घर एकत्रित होते है और मनन्तधारी व्यक्ति को बाबा गळ देव पर ले जाते है। बाबा गळ देव पर मुर्गा तथा बकरे की बली चढ़ाकर मन्नत उतारते तथा मन्नतधारी व्यक्ति के सफल जीवन एवं पारिवारिक स्वास्थ्य हेतु दुआ करते है। मन्नतधारी व्यक्ति को 20 से 25 फिट ऊँचे खम्भों पर चारपाई बिछाकर बैठे आदिवासी पुजारी लोग बाँस की लकड़ियों से बने झुले पर बाँधकर सात या पाँच बार झुलाते हुए परिक्रमा करवाते है। परिक्रमा के दौरान मन्नतधारी व्यक्ति गळ देवरा मंत्र का जाप लगाता है। बाद में सभी लोग हँसी-खुशी मन्नतधारी व्यक्ति के घर जाते है और स्नेह भोज करते है। इसके साथ सात दिवसिय भगोरिया हाट एवं होली पर्व का समापन होता है।

      द्वारा

    बेनेडिक डामोर बालु भूरिया झाबुआ मप्र

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