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    Tuesday, January 2, 2018

    भियां सभी को नए साल की शुभकामनाए.... सोचो तो ..... हम क्या कर रिये है.... हुसैन के राशन कार्ड की हकीकत तो पता लगाओ


    भियां..... सभी को नए साल की दुआ सलाम, राम राम, जय येसु, सत् श्री अकाल और तमाम धर्मालंबियों को उनके धर्मानुसार कही-अनकही की शुभकामनाएं... भियां बिता वर्ष खटटा मीठा और नमकीन जैसा भी रहा हम सब के लिए कहीं न कही सुखद ही रहा। वर्ष के अंत में कहीं-अनकही की कुछ दुमछल्लों को ऐसी मीर्ची लगी की भियां लोग तिलमिला गिये.... तिलमिलाना भी स्वाभाविक था..... कही अनकही ने उनकी उनकी दुखती नस पर हाथ जो रखा था। भियां लोगों के लिए तो यही चरितार्थ हुआ बिना विचारे जो करें सो पाछे पछताए पत्रकारिता में पत्रकार की न किसी से दोस्ती होती और नही किसी से दुश्मनी .... पत्रकार तो सिर्फ पत्रकारिता के माध्यम से समाज का आईना बना रहता है..... कहीं-अनकही भी आईना ही बनी थी..... लेकिन भियां लोगों को कब कहां और किसने जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना की तर्ज पर भियां लोग पहुंच गए...... कानुन रक्षकों के पास आवेदन देने और बनाने लगे दबाव... केने लगे भियां पर कार्रवाई कर जेल भेजों अच्छा होता। 
    मैं ये नी के रिया की... संविधान में किसी को अधिकार प्राप्त नही है... संविधान में मौलिक अधिकार दिए है.... स्वतंत्रता भी एक अधिकार है.... प्रजातंत्र में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ माना है..... इस स्तंभ को कायम रखने में लगे है पर कुछ एक भियां... लोगों को कही-अनकही जैसी हकिकत से मिर्ची लगती है... तो अपने काले कारनामें भी भूल बैठते है पर उन्हे यह नही पता की बिल्ली जब आंख बंद कर दुध पीती है तो यही सोचती है कि उसे कोई नही देख रहा। जबकि बिल्ली को दुध पीते दुनिया देखती है।
    भियां लोग अपने गिरेबां में झांक लेते और उस गोधरा कांड के आरोपी का राशन कार्ड बनाने का मामला उठाते। शायद कार सेवा कर साबरमती से लौंट रहे कारसेवकों की असलियत जहन से उतर गई होगी.... पर मैं याद दिला रिया हुं कि 27 फरवरी 2002 को गोधरा में जो हत्याकांड हुआ था, वह निष्चित रूप से दुखद था। श्री रामजन्मभूमी , अयोध्या से कार सेवा कर वापिस आ रहे मासुम बच्चे, स्त्री और पुरूषों को लेकर आ रही साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नम्बर एस 6 में पेट्रोल डाल कर निर्दयता पूर्वक जिन्दा जला दिया गया। जिसमें 59 कारसेवकों हिन्दुओं की मौत हो गई। इतनी निर्दयता पूर्वक हत्या ने सबकी आंखों में आंसु ला दिए थे, पुरा देष इस घटना के शोक में डुब गया था। 
    इस घटना को अंजाम देने वालों मे से एक हुसैन पिता सुलेमान मोहन 13 वर्षो से गुजरात से फरार झाबुआ में रह रहा था। 22 जुलाई 2015 की रात एलसीबी (लोकल क्राइम ब्रांच) की 8 सदस्यीय  टीम ने बिना झाबुआ पुलिस को बताए शहर की विवेकानंद काॅलोनी से उसे गिरफतार किया।
    हुसैन सुलेमान की गिरफतारी के बाद गोधरा क्राईम ब्रांच की टीम ने इस बात की पुष्टि की थी कि उक्त आरोपी गुजरात के गोधरा हत्या कांड में नामजद  आरोपी है। जो पिछले कई वर्षो से गुजरात से फरार था। टीम ने यह भी बताया था कि आरोपी के पहचान वाले झाबुआ में  रहते है जिनकी मदद से वो यहां पहुंचा।  टीम ने हुसैन सुलेमान मोहन को पकडने के बाद उसके समस्त दस्तावेज जो झाबुआ में बने जिनमें राषन कार्ड, ड्राईविंग लाईसेस और वोटर आईडी को भी जप्त कर लिया था। हुसैन यहां कैसे पहुंचा, किसने हुसैन का राषन कार्ड बनाया, किसने मतदाता सुची में नाम दर्ज करवाया, किसने ड्राईविंग लाईसेंस बनवाया, इसकी तहकीकात भियां लोग खुद अपना जनप्रतिनिधित्व को झंकझोर कर देख लेते तो किसी पर उंगली उठाने की नौबत नी आती। एक अंगुली कही-अनकही पर उठी तो तीन अंगुलिया भियां लोगों के तरफ ही ईषारा करती है। पत्रकारिता पेषा ही ऐसा है सच का सामना करती है। गढे मुर्दे उखाडती है और वक्त आने पर प्याज के छिलकों की तरह घटनाओं की तह में पहुंच छिलके भी निकालती है। गोधरा कांड के आरोपी का राषन कार्ड बनवाने वाला समझ जाए भियां अभी तो ठिक नही तो ताष के पत्तों पर बना महल कभी भी पत्रकारिता की आंधी में बिखर भी सकता है। 
    भियां अब जा रिया.... पर न तो मैं भाजगडिया हुं और न ही ताश  के पत्तों से महल बनाने वाला... मैं न तो समाज व देश  विरोधी कृत्य करने वाला हुं, मैं तो शुद्ध शाकाहरी लिखड हुुं ......  लिखते आता है ऐसा लिखता हुं... और लिख रिया हुं..... जा रिया.... सभी को एक बार फिर नए साल की राम राम, दुआ सलाम जय येसु, सत् श्री अकाल  ।. 



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