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    Sunday, April 8, 2018

    मां के दो आंसु सुख गिये....... और फोटोछाप लुट रिये वाह वाही...... घोषणाएं कर फोटोछापों ने माल किया अंदर



    ...... भियां सबको मेरा नमस्कार.... लो भियां मैं फिर आ गिया कुछ कही-अनकही के साथ..... भियां एक वर्ष पूर्व  फोटोछाप रसुखदारों की टोली ने.... फोटो छपवाने के लिए...... लोगों के कंठों की प्यास बुझाने के लिए..... लगाया गिये..... प्याउ पर कब्जा कर लिया...... और वाह...... वाही..... लुटने के लिए...... भाषणबाजी कार्यक्रम आयोजित कर...... प्याउ पर नाम लिखवाने लग गिये और ये फोटो छाप सिर्फ घोषणा वीर बन.... प्याउ को मां का रूप देने लग गिये....  मात्र वाह..... वाही के चक्कर में.... फोटोछापों ने..... मां के दोनों आंसु सुखा  दिये...... भियां बात ये हो री है के मां के इतने बेटे होने के बाद भी मां के आंसु कैसे सुख गिये.... ये समझ नी आ रिया था....  जब चाय की टपरी पर बैठ मां के दो आंसु के बारे में सोच  रिया था.... कि स्कूल के दिनों में संस्कृत में पढा वो श्लोक याद आ गिया..... एकेनापि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम्......... सहैव दशभिः पुत्रैर्भारं वहति रासभी.... भियां मतलब तो आप लोग समझ गिये होंगे..... लेकिन मैं एक बार फिर सीधे सीधे बिता देता हुं...... एक पुत्र होने पर शेरनी निर्भय होकर सोती है..... मगर दस पुत्र होने पर भी भी गदर्भी (गधी) भार ढोती है। 
    अब तो आप समझ गिये होगे.... भियां इन फोटोछाप रसुखदारों की टोली ने प्याउ को मां का स्वरूप देते समय 24 घंटे ठंडा व फिल्टर पानी..... देने की बात के रिये थे..... बडे वादे कर रिये थे.... अब राहगिरों के कंठ सुखेंगे नही...... आस पास के लोगों को भी पानी के लिए परेशान नही होना पडेगा.... लेकिन ये क्या भियां फोटो छापों के वादे वादे ही रे गिये....मां के दोनों आंखु सुख गिये....... और लोगों को अपने कंठों का तर करने के लिए आस पास होटलों का सहारा लेना पड रिया है..... और अगर पानी आता भी है वो पीने योग्य ही नही है... उसका स्वाद ही अलग है.... भियां मैं इसलिए के रिया हुं.... की मैं खुद कई बार इस प्याउ पर गिया..... कभी तो पानी मिला ही नी.... और जब मिला..... जब वो पीने योग्य ही नी लग रिया है.... भियां...... फोटोछाप रसुखदारों........ ;यहाँ  न तो फिल्टर ..... और न  ही  ठंडा पानी मिल  रिया है.... तो उन वादों का क्या... कही ऐसा तो नही.... मां के नाम पर जो पैसा इकटठा किया था ..... वो हजम कर गिये... और नकली सामान लगा गिये ..... 
    लो भियां अब मैं जा रिया.... लेकिन जाते जाते एक बात और बिता दुं..... भियां फोटोछापों तुम्हारी वजह से मां के दो आंखु सुख गिये.... जब नपा इस प्याउ पर पानी पीला री थी.... तब अच्छा और स्वच्छ पानी मिल तो रिया था..... जिससे लोगों के कंठों की प्यास तो बुझ री थी.... लेकिन अब मां के इतने सारे पुत्र होने के बाद भी मां के आंसु सुख गिये.... तभी तो विदवानों ने सच किया.... एकेनापि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम्......... सहैव दशभिः पुत्रैर्भारं वहति रासभी.... नपा ने इस प्याउ को शेरनी बना अच्छे पुत्र की मिशाल दी और रसुखदारों की इतनी बडी टोली ने मां को क्ष/गधी  बना डाला...... बड़ी शर्म की बात  है माँ  का स्वरूप देने वाले  माँ को अपमानित कर रिये है ...... पहली बार ,ऐसे बेटे  देखे  जिन्हे माँ की परवाह नहीं .....या फिर इन बेटो में संस्कार ही नहीं .........    अब जा रिया.... भारत माता की जय!


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