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    Monday, March 12, 2018

    देशी गुड की महक अब महानगरों तक....... छोटे से कस्बे करडावद में बनने वाला गुड जिले को दे रहा है एक नई पहचान



    पेटलावद से राजेश राठौड की रिपोर्ट...........
    हमने बचपन से अनेक कहावतें सुनी हैं गुड को लेकर, ‘गुड खाकर गुलगुले से परहेज’ या फिर ‘गूंगा क्या बताएगा गुड का स्वाद’. मगर इस गुड को बनाने का काम बड़ा चिपचिपा और धैर्यभरा है. गन्ने से गुड बनता है, यह बात हम सब जानते हैं, मगर गन्ने को तैयार होने में मानव-भ्रुंण जितना ही समय लगता है, यह बात कम लोग जानते होंगे. जी हाँ, पूरे छः महीने लगते हैं. अक्टुबर नवम्बर से इसकी बुआई चालु हो जाती।
    वर्तमान समय में गन्ने का रस निकालकर गुड बनाने का काम जोरों पर है,  इस समय किसान गेहूं चने की फसल के साथ साथ गन्ना पिराई के काम में भी लगे हुए हैं। एक समय ऐसा था जब झाबुआ जिले के छोटे से कस्बे करडावद जिसे गन्ना उत्पादन का गढ़ माना जाता था। लेकिन कम बारिश एवं लागत मूल्य के साथ साथ उपज का सही कीमत नहीं मिलने से किसानों की रुचि  गन्ने की खेती में कम होती जा रही थी। मगर कुछ वर्षो से माही नहर का पानी किसानों को मिलने की वजह से एक बार फिर किसानों की रूची गन्ने की खेती की ओर बढने लगी है। किसान रामचंद्र आंजना और जवाहर कोरट आदि का कहना है कि अब शहरी क्षेत्रों के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी देशी गुड की मांग बढती जा रही है। देश गुड औषधी के रूप में भी काम आता है। महिलाओं के प्रसव के बाद इसका उपयोग औषधी विशेष रूप से उपयोग में किया जाता हैं किसाना रणछोड भगत का कहना है जहां विदेश या फिर बाजार में बिकने वाला गुड 30 से 40 रूपए प्रतिकिलो के भाव से आसानी से मिल जाता है। लेकिन देशी गुड 70 से 80 रूपए किलो भाव से मिलता है। पहले किसान बैलों के माध्यम से चरखी बनाकर गन्ने का रस निकालते थे लेकिन आधुनिकता के इस दौर में अब यह काम मशीनों के माध्यम से किया जा रहा है।
    कैसे बतना है देशी गुड
    देशी गुड बनाने के लिए सर्वप्रथम अच्छी किस्म के गन्ने चुन उन्हे साफ करने के बाद मशीन की सहायता से रस निकालकर बडी कढाई में संचित कर लिया जाता है। बाद में इस गन्ने के रख को पकाने के लिए एक बडी भटटी या फिर बडा चुल्हा बनाकर एक बडी कडाई में उस रस को डाल दिया जाता है और चुल्हे में निरंतर आई जलाई जाती है। गन्ने का रख उबालते समय सुखलाई के पौधे के तने तथा जडा का रस डाला जाता है। जिससे रस में मिले हुए सभी कुडे झाग उबले समय उपर आ जाते है। जिसे बाहर निकाल दिया जाता है। इसके उपरान्त कुछ समय तक रस को पकने के लिए छोड दिया जाता है। करीब ढाई से तीन घंटे रस गाढा हो जाता है और उसे सांचे या बर्तन में निकाल उस आकान में बना ठंडा होने के बाद निकाल लिया जाता है। 200 से 250 लीटर गन्ने के रस में 60 से 70 किलो देशी गुड बनता है।  
    बडे महानगरों तक भी पहुंच रही है देशी मिठास
    छोटे से अंचल में बनने वाला गुड इन दिनों बडे बडे महानगरों के मुंह की मिठास बना हुआ है.... क्षेत्र में बनने वाले देशी गुड की शुद्धता इतनी अच्छी है कि अब जिले ही नही वरन बडे बडे महानगरों की अब पसंद बनने लगा है। पहले आस पास के क्षेत्र में ही इसका देशी गुड का विक्रय हो जाता था। गुड की शुद्धता एवं गुणवत्ता की बात सुन महानगरों के लोग भी इस ओर रूख करने लगे है। जिसकी वजह से देशी गुड की मांग बढने लगी है। इस छोटे से कस्बे में बनने वाला ये देशी गुड जिले को एक नई पहचान दे रहा है। वही किसानों को गन्ने की खेती से अच्छा लाभ हो रहा है। क्षेत्र में कई ग्रामीण अब गन्ने की खेती की ओर अग्रसर होते नजर आ रहे है। 



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