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    Saturday, July 7, 2018

    जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में जैविक कृषि का प्रभाव पर हुई कार्यशाला आयोजित


    झाबुआ। आज शनिवार को जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में जैविक कृषि का प्रभाव एवं अध्ययन पर रिपोर्ट प्रस्तुतिकरण कार्यशाला होटल शांतिनिकेतन में आयोजित की गई। जिसमें झाबुआ एवं रानापुर ब्लाॅक के 50 किसानों ने भाग लिया व अपने अनुभव बांटे। मध्यांचल फोरम इंदौर के जिला समन्वयक बेनेडिक डामोर ने बताया कि जैविक खेती का नाम वैज्ञानिकों ने दिया है क्योंकि वो वर्तमान में हो रही खेती को पारम्परिक खेती मानते है। वैसे अगर भारत की बात करें तो भारत मे आजादी के पहले से पारम्परिक खेती जैविक तरीके से ही की जाती थी। जिसमें किसी भी प्रकार के रसायन के बिना फसलें पैदा की जाती थी। लेकिन आजादी के बाद भारत को फसलों के मामलें में आत्मनिर्भर बनााने के लिए लिए हरित क्रान्ति की शुरूआत हुई जिसमें रसायनों एवं किटनाशकों की मदद से उन फसलों का भी भरपूर मात्रा में उत्पादन किया जाने लगा जिसके बारें में कोई सोच भी नही सकता था। 
    हरित क्रान्ति के कारण गेहुं, ज्वार, बाजरा और मक्का की खेती में काफी विकास हुआ। इस हरति क्रान्ति के दौरान 1960 के दशक में जहां प्रति हेक्टेयर 2 किलोग्राम रासायनिक उर्वरक का प्रयोग किया जाता था। वहीं आज प्रति हेक्टेयर बढकर 100 किलोग्राम से भी ज्यादा हो चुका है हरित क्रान्ति के कारण जिस जैविक खेती को भारत बरसों से आजमा रहा था वो खत्म हो चुकी थी। हालांकि खदयानों का काफी उत्पादन हो रहा है। लेकिन मृदा की उर्वरक शक्ति घटती जा रही है जिसके कारण कई खेत बंजर हो चुके है।
    तब वर्तमान में रासायनिक खेती के बढते प्रभाव को देखकर वैज्ञानिकों ने इसे घातक सिद्ध कर दिया है और ना केवल मृृदा बल्कि इंसानों की सेहत पर भी इसका प्रभाव पड रहा है। इसी प्रकार बढते प्रभावों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने जैविक खेती को मृदा की उर्वरा और इंसानों की सेहत के लिए अच्छा बताया है। आज अनेकों बीमारियों से पीडित लोगों को जैविक खेती से उपजी फसलों को खाने की हिदायत दी जाती है। जिसके कारण कई किसानों ने जैविक अपनाना शुरू कर दिया है। हालांकि अभी जैविक खेती बहुत ही छोटे स्तर पर हो रही है। लेकिन अगर जागरूकता फैलाई जाए तो आने वाले समय में यह पारंम्परिक खेती का रूप ले लेगी। 
    कार्यक्रम में सहायक संचालक कृषि विभाग एसएस चैहान ने किसानों को जैविक कृषि को बढावा देने हेतु संबोधित किया। अध्ययन रिपोर्ट को प्रस्तुतिकरण अजहर उल्ला खान ने किया सर्वेक्षण एवं सुचना संग्रहण का कार्य कैलाश सिंगाड एवं पराग डामोर ने किया। 


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