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    Saturday, November 3, 2018

    क्या महावीरसिंह राठौर जैसों का बलिदान व्यर्थ हैं... रानापुर दंगों में हडडीयां तुडवाई वो भी व्यर्थ है... तो दे दो फुलछापों परेराशुट नेता को टिकट


                  भियां सभी को राम...राम.... भियां विधान सभा चुनाव आते ही.... साल भर में ऐसे पेराराशुट नेता उतरे... जो शासकीय पद पर रहते हुए शासन को करोडों का चुना लगाकर... अब समाजसेवी का छोला ओढ..... टिकट की मांग कर रिये है.... और चंद पैसों में बिकने वाले फुलछाप नेताओं जिनके साथ न जन है और न ही जनाधार.... परेराशुट नेता के साथ मिल.... फुलछाप आलाकमान को गांधीछापों के दम पर पार्टी को हरवाने की बात कर रिये है... वहीं फुलछाप आलाकमान भी....गांधीछापों के सामने नतमस्तक है... उन्हे कोई फर्क नही पडता.... किसने बलिदान दिया... और फुलछाप का झंडा अंतिम छोर तक किसने पहुंचाया...। उन्हे तो बस गांधीछापों से प्यार है....।
                भियां एक समय ऐसा था... जब जिले में एक तरफा हाथछाप का वर्चस्व था... फुलछाप को तो गांव में घुसने तक नी दे रिये थे... फिर भी डंडों से पिटाई... और तिरस्कार सहने के बाद भी अंतिम छोर तक जिन्होने फुलछाप का झंडा फहराया....  ऐसे कर्मठों को आज न तो याद किया जा रिया है और न ही उनके बलिदान पर खेद प्रकट कर रिये है। 
                भियां पेटलावद क्षेत्र में ऐसे ही एक कर्मठ कार्यकर्ता थे.... महावीरसिंह राठौर जिन्होने एक तरफा हाथछाप का वर्चस्व होने के बाद भी फुलछाप के झंडे क्षेत्र में गाडे... ऐसा कोई ग्रामीण नही था... जिनकी उन्होने सेवा नही की... हर पल हर समय सेवा भाव लिए लोगों का हित करने वाले महावीरसिंह राठौर का बस इतना कसुर था... कि वह फुलछाप की रिती नीति के अनुसार अंतिम छोर तक जनता की भलाई में जुटे.... और एक किसान जिसकी जमीन पर पेरोशुट नेता कब्जा करना चाह रिया था... उस किसान कीे हक की लडाई लड रिये थे... इसी वजह से चारों ओर से घेराबंदी कर उनकी हत्या करवा दी... लेकिन आज फुलछाप के आलाकमान स्व. महावीरसिंह बलिदान को ध्यान नी रखते हुए पेराशुट नेता को प्रमोट कर रिये है... वहीं समाज और कुछ छुट भईये नेता.... इस पेराशुट नेता की तरफदारी... कर... तो रिये है.... मगर ये भुल गिये है कि हमने तो झंडा नी गाडा... पर जिसने झंडा गाड उसके बलिदान का क्या... जिसने महावीर की हत्या में अहम भूमिका निभाई उसे ही फुलछाप और समाजजन आगे ला रिये है... कितनी शर्म की बात है। 
            
              भियां कुछ ऐसा ही रानापुर दंगों में भी हुआ था... जिन्होने फुलछाप के झंडे हाथ छाप के राज में गाडे... उन्हे पेराशुट नेता की पत्नि ने प्रशासनिक पद पर रहते हुए... हाथछाप नेताओं के कहने पर पीटवाया था... इन फुलछाप कर्मठ कार्यकर्ताओं को इतना पीटा गिया... कि उनके पैर  की हडडीयां तक  तोड दी गी।... लेकिन फिर भी आखरी तक इन कर्मठों ने फुलछाप के झंडे गाडे.... और अब आलाकमान ऐसे पेराशुट को अपना हितैशी मान री है जिसने हाथछाप के राज में फुलछाप का वर्चस्व जिले भर में रखा... मार खाई और उनकी हत्या भी हुई...। ऐसे में इन सब का बलिदान व्यर्थ है तो दे दो आलाकमान पेराशुट नेता को टिकट। 
          
             भियां अब जा रिया लेकिन जाते जाते एक बात और बिता दुं.... कैसे हुई महावीरसिंह राठौर की हत्या.... उमाजी ने क्यों दिया था धरना... क्या लिखा था एफआईआर.. जल्द ही पढीये मेरी कही-अनकही.... जब जा रिया... जय राम जी की। 

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