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    Tuesday, January 15, 2019

    खाटू श्याम की निशान यात्रा ने नगर को किया श्याम मय.... खाटू श्याम पर विश्वास रखने वाला कभी निराश नही होता- बंटी सोनी


    झाबुआ ।नगर में मंगलवार को श्री खाटूश्याम की भजन संध्या के पूर्व हारे का सहारा,बाबा श्याम हमारा समिति की ओर से श्री बांके बिहारी मंदिर राजवाडा चैक से प्रातः 10-30 बजे से विशाल निशान यात्रा का  आयोजन किया गया जिसमें नगर सेहित रानापुर, थांदला, मेघनगर, सहित दूर दूर से श्याम भक्तों ने निशान यात्रा में भाग लिया । निस्वार्थ श्याम प्रेमी बंटी सोनी मक्सी ने बांके बिहारी मंदिर पर भगवान श्री राधा कृष्ण की आरती पूरी श्रद्धा  के साक्थ उतारी । आरती के बाद खाटू जी श्याम को सजे हुए रथ में बिराजित किया गया । बेंड बाजों के साथ श्री खाटू श्याम की शोभायात्रा नगर के नेहरू मार्ग, गोवर्धनार्थ मंदिर, आजाद चैक, बाबेल चैराहा, थांदला गेट से होते हुए बस स्टेंड पहूंची। बेंड बाजो के अलावा जोबट के आदिवासी नर्तक दल द्वारा अपनी संगीतमय प्रस्तुति से वातावरण को सुंदर बनाया वही हाथ मे ध्वज निशान लेकर बडी संख्या में महिलाओं द्वारा बेंड की धुनों में आकर्षक  गरबा रास प्रस्तुत किया । वही युवकों ने जय जय कारो के साथ पूरे नगर को श्याम मय बना दिया । शोभायात्रा में भजन गायक बंटी सोनी विशेष रूप  से सम्मिलित हुए  जिनका नगर की विभिन्न संस्थाओं एवं मसज सेवी संस्थाओं ने पुष्पमालायें पहिना कर स्वागत किया । बस स्टेंड से विशान निशान शोभा यात्रा लक्ष्मीबाई मार्ग होते हुए राजवाडा चैक स्थित कीर्तन स्थल पहूंची जहंा महा मंगल आरती के साथ निशानयात्रा का समापन हुआ ।

    श्री खाटूश्याम के चमत्कारिक स्वरूप के बारे मे बताते हुए बंटी सोनी ने बताया कि श्री श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या मौरवी के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा श्री कृष्ण से सीखी। भगवान् शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे। महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुए तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े। सर्वव्यापी श्री कृष्ण ने ब्राह्मण भेष धारण कर बर्बरीक के बारे में जानने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया हैय ऐसा सुनकर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिए पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तूणीर में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो पूरे ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाएगा। यह जानकर भगवान् कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस वृक्ष के सभी पत्तों को वेधकर दिखलाओ। वे दोनों पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। बाण ने क्षणभर में पेड़ के सभी पत्तों को वेध दिया और श्री कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया थाय बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए अन्यथा ये बाण आपके पैर को भी वेध देगा। तत्पश्चात, श्री कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा, बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन को दोहराया और कहा युद्ध में जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा। श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की निश्चित है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा। अतः ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की। बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया और दान माँगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे शीश का दान माँगा। वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए अचम्भित हुए, परन्तु अपने वचन से अडिग नहीं हो सकते थे। वीर बर्बरीक बोले एक साधारण ब्राह्मण इस तरह का दान नहीं माँग सकता है, अतरू ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की। ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गये। श्री कृष्ण ने बर्बरीक को शीश दान माँगने का कारण समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पूर्व युद्धभूमि पूजन के लिए तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय के शीश की आहुति देनी होती हैय इसलिए ऐसा करने के लिए वे विवश थे। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अन्त तक युद्ध देखना चाहते हैं। श्री कृष्ण ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। श्री कृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न होकर बर्बरीक को युद्ध में सर्वश्रेष्ठ वीर की उपाधि से अलंकृत किया। उनके शीश को युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गयाय जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे। 
    महाभारत युद्ध की समाप्ति पर पाण्डवों में ही आपसी विवाद होने लगा कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है? श्री कृष्ण ने उनसे कहा बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये और पहाड़ी की ओर चल पड़े, वहाँ पहुँचकर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्री कृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उपस्थिति, युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली, कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं। श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है।
    श्री सोनी ने बताया कि खाटू श्याम को यदि श्रद्धा से स्मरण किया जावे तथा उनकी मन्नत ली जावे तो हर व्यक्ति जो सभी ओ र से निराश हो चुका है, उसके कष्टो का निवारण चमत्कारिक तरिके से होता है।
    रात्री में 8 बजे से भजनो की समाप्ति क श्री श्याम महाकीर्तन एवं ज्योति दर्शन का आयोजन हुआ जिसमें भगजन गायक बंटी सोनी एण्वं लक्ष्मीनारायण कुमावत द्वारा श्री ष्याम महार्मीन के तह4त एक से एक भजनों की प्रस्तुति दी गई जिसमें श्रोताओं ने झुम कर लाभ उठाया ।

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