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    Monday, March 4, 2019

    आदिवासी समाज का सामाजिक संवैधानिक जन-जाग्रति चिंतन शिविर का हुआ आयोजन


        झाबुआ। सांस्कृतिक, संवैधानिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, नशामुक्ति जन जागरण सम्मेलन ग्राम बन तहसील रानापुर में संपन्न हुआ। जिसमे कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजस्थान से पधारे समाज चिंतक  भंवरलाल परमार, गुजरात से  सकजी गुरु, बड़वानी से पधारे जयस संस्थापक  विक्रम  अछलिया , जयस प्रदेश प्रवक्ता श्री महेन्द्र कन्नौज थे, झाबुआ -अलीराजपुर-रतलाम के सांसद कांतिलाल भूरिया, झाबुआ विधायक गुमान सिंह  डामोर ने भी जय जोहार के उद्घोष के साथ सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डाले यहीं समाज के युवावर्ग ने मंच से प्रश्न पूछने लगे तब जनप्रतिनिधि इधर-उधर देखते हुए टाल-मटोल कर हां में हाँ मिलाते रहे। 


        कार्यक्रम का शुभारम्भ आदिवासी रीति-रिवाज पंचतत्व बाबादेव, धरती मां की पूजा अर्चना के साथ किया। साथ ही भगवान बिरसा मुंडा, क्रांतिकारी टंट्या भील, वीर सेनानी परथी दादा भूरा, वीरांगना रानी दुर्गावती, तिलका माझी, राणा पुंजा भील, वीर एकलव्य, रघुनाथशाह मंडावी, शंकर शाह की प्रतिमा पर पुष्प हार अर्पित कर पूजा अर्चना की।


          स्वागत भाषण सामाजिक कार्यकर्ता प्रो महेश भाबर ने देते हुए "आदिवासी चिंतन शिविर" के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए शिविर में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश से पधारे वक्तागणों ओर रतलाम, अलीराजपुर, धार, खरगोन, झाबुआ से पधारे समाजजनों का स्वागत करते हुए समाज की संस्कृति, वैचारिक एकीकरण ओर संवैधानिक हक/अधिकारों, जल-जंगल और जमीन का संरक्षण के साथ मालकियत का हक से सम्बंध में सारी बिंदुओं पर प्रकाश डाला। शिविर में उपस्थित मुख्य वक्ता श्री भंवरलाल जी परमार ने आदिवासियों की ऐतिहासक सांस्कृतिक शुद्धिकरण व संवैधानिक अधिकारों से उपस्थित समाजजनों को अवगत करवाया। वहीं गुजरात से पधारे सकजी गुरुजी ने संस्क्रति बचाव, सामाजिक पारंपरिक रुढ़ी प्रथाओं की पर अपनी बात रखते हुए भील गीत के माध्यम से समाज को जाग्रत करने का संदेश दिया, जयस संस्थापक श्री विक्रम जी अछालिया ने आदिवासियों की पूजा पद्धति, कार्य शैली के बारे में बताया कि हम हर कार्य प्रकृति को आधार मानकर करते है, धरती, सूरज, चांद, वायु, अग्नि से हमारा अटूट संबन्ध है। शिविर में हजारों की संख्या में आदिवासी भाई बहन उपस्थित थे। जयस के प्रदेश प्रवक्ता श्री महेन्द्र जी कन्नौज ने अपने चिर परिचित अंदाज में आदिवासी गीत प्रस्तुत किया। संचालन  भीम सिंह जी मसनिया एवं अनिल कटारा ने किया।  आभार लक्ष्मण जी डिंडोर ने माना।

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